24.6.05

बाजीगर बन गई व्यवस्था

बाजीगर बन गई व्यवस्था
हम सब हुए जमूरे
सपने कैसे होंगे पूरे ॥

चार कदम भर चल पाये थे
पैर लगे थर्राने
क्लान्त प्रगति की निरख
विवशता छाया लगी चिढ़ाने
मन के आहत मृगछौने ने
बीते दिवस विसूरे।
सपने कैसे......................॥

हमने निज हाथों से युग
पतवार जिन्हें पकड़ाई
वे शोषक हो गए हुए
हम चिर शोषित तरुणाई
'शोषण' दुर्ग हुआ अलवत्ता
तोड़ो जीर्ण कंगूरे।
सपने कैसे.........................॥

वे तो हैं स्वच्छन्द,
करेंगे जो मन में आएगा
सूरज को गाली देंगे
कोई क्या कर पाएगा
दोष व्यक्ति का नहीं,
व्यवस्था में छल छिद्र घनेरे।
सपने कैसे.............................॥

बदल गए आदर्श,
आचरण की बदली परिभाषा
चोर–लुटेरे हुए घनेरे
यह अभिशप्त निराशा
बदले युग के वर्तमान को कैसे मैं बदलूं रे
सपने कैसे..................................॥
***

-डॉ॰जगदीश व्योम
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